नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा ने देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने के लिए कानूनों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की व्यवस्थित समीक्षा पर जोर दिया है। मुंबई में आयोजित GFF 2026 के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत में अगली पीढ़ी के सुधारों का मुख्य आधार वि-नियमन (deregulation) होना चाहिए। गौबा के अनुसार, अब हमें पुराने लाइसेंस, अप्रूवल और परमिट वाली व्यवस्था से पूरी तरह बाहर निकलने की आवश्यकता है।
बीते दशक में हुए बड़े सुधारों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि GST, IBC और विदेशी निवेश नियमों के उदारीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदली है। इन कदमों ने उन क्षेत्रों के दरवाजे भी निजी उद्यमों के लिए खोल दिए, जहाँ पहले पहुंच सीमित थी। आज रक्षा, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र सुधारों के एजेंडे का हिस्सा बन चुके हैं।
गौबा ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि सुधारों की यह प्रक्रिया केवल केंद्र तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे राज्यों और शहरों के स्तर तक ले जाना अनिवार्य है। 'ट्रस्ट-बेस्ड गवर्नेंस' यानी विश्वास आधारित शासन के दर्शन को अपनाते हुए केंद्र सरकार राज्यों को भी सुधारों के लिए प्रोत्साहित कर रही है, जिसमें सहकारी संघवाद (cooperative federalism) की एक प्रतिस्पर्धात्मक झलक देखने को मिलती है।
वित्तीय प्रौद्योगिकी (fintech) क्षेत्र के संदर्भ में उन्होंने कहा कि भारत की डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे Aadhaar, UPI, DigiLocker और अकाउंट एग्रीगेटर फ्रेमवर्क वैश्विक स्तर पर रोल मॉडल बन सकते हैं। उन्होंने सलाह दी कि तकनीक-संचालित क्षेत्रों में नियमन ऐसा होना चाहिए जो सार्वजनिक हित की रक्षा करने के साथ-साथ नवाचार को फलने-फूलने का पूरा मौका दे। नीति निर्माताओं को नियमों को सिद्धांतों पर आधारित, तकनीक-तटस्थ और जोखिम के अनुपात में रखने की जरूरत है।
भविष्य की रणनीति पर बात करते हुए गौबा ने कहा कि सरकार नीतिगत स्पष्टता, डेटा गवर्नेंस और साइबर सुरक्षा को मजबूत कर निवेश का भरोसा बढ़ा रही है। उनका मानना है कि सरकार, उद्योग और नागरिकों के सामूहिक प्रयासों से ही 'विकसित भारत' के संकल्प को साकार किया जा सकता है। सुधारों को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि शासन की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बनाने की आवश्यकता है ताकि विकास की गति निरंतर बनी रहे।