विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भारत की आठवीं व्यापार नीति समीक्षा के दौरान उसके दो सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों, US और EU ने कई नियामक और गैर-टैरिफ बाधाओं को लेकर चिंताएं जाहिर की हैं। इन देशों का तर्क है कि भारत की वर्तमान व्यापार नीतियां अर्थव्यवस्था को खोलने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एकीकृत होने के प्रयासों को कमजोर कर रही हैं।
समीक्षा के दौरान US ने स्पष्ट किया कि हालांकि वे भारत के व्यापार समझौतों को लेकर उत्साहित हैं, लेकिन भारत को टैरिफ कम करने, अनुचित SPS (सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी) और TBT (व्यापार में तकनीकी बाधाएं) उपायों को हटाने की आवश्यकता है। साथ ही, विदेशी निर्यातकों और निवेशकों के खिलाफ भेदभावपूर्ण नियमों में बदलाव करना भी जरूरी है। US ने विशेष रूप से स्थानीय सामग्री की आवश्यकताओं पर आपत्ति जताई है, जिसे वह ICT वस्तुओं, सेवाओं और चिकित्सा उपकरणों की प्रतिस्पर्धा के लिए हानिकारक मानता है। डिजिटल व्यापार और ई-कॉमर्स जैसे क्षेत्रों में भी US ने निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने का आग्रह किया है।
वहीं, EU ने भारत में सीमा शुल्क प्रक्रियाओं के अप्रत्याशित होने और गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (QCOs) के बढ़ते उपयोग पर सवाल उठाए हैं। EU का मानना है कि ये आदेश अंतरराष्ट्रीय मानकों से अलग घरेलू मानकों पर आधारित हैं, जो भारतीय बाजार को वैश्विक अर्थव्यवस्था से अलग-थलग कर सकते हैं। हालांकि, EU ने इस बात को स्वीकार किया है कि NITI Aayog की एक उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट के बाद भारत ने सुधार प्रक्रिया शुरू कर दी है।
भारत ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उसके SPS उपाय सार्वजनिक स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और जैव सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए हैं। इसके अलावा, तकनीकी नियमों का उद्देश्य धोखा देने वाली प्रथाओं को रोकना और मानव, पशु व पौधों के जीवन की रक्षा करना है। भारत ने यह भी कहा कि वह पारदर्शिता बनाए रखने और WTO के सदस्यों के साथ जुड़ाव जारी रखने के लिए प्रतिबद्ध है। इन चर्चाओं के बीच, भारत के 2025 के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण नियमों पर भी बात हुई है, जहाँ सदस्य देशों ने डेटा प्रवाह पर अनावश्यक प्रतिबंधों से बचने की सलाह दी है।