अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में 15 वर्षीय किशोरी की मृत्यु के मामले में अब अस्पताल प्रशासन ने एक उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। किशोरी के उपचार और उसकी मृत्यु से जुड़ी परिस्थितियों की समीक्षा के लिए एक समिति गठित की गई है, जो मेडिकल रिकॉर्ड, विशेषज्ञ डॉक्टरों की राय और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का विश्लेषण करेगी।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, किशोरी को बचपन से ही हृदय से जुड़ी एक जटिल जन्मजात बीमारी थी। वर्ष 2012 में जब वह 2 साल की थी, तब उसे वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट (VSD) और पल्मोनरी एट्रेसिया के रूप में पहचाना गया था। उसके बाद के वर्षों में, उसकी स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कई बार विस्तृत जांच की गई। वर्ष 2014 में अस्पताल के दस्तावेजों में सर्जरी की आवश्यकता का उल्लेख किया गया था, लेकिन अस्पताल प्रशासन का कहना है कि बाद के वर्षों में जब हृदय की संरचना की जटिलताओं का गहराई से मूल्यांकन किया गया, तो डॉक्टरों ने पाया कि सुधारात्मक सर्जरी करना तकनीकी रूप से संभव और सुरक्षित नहीं था।
किशोरी के परिजनों का आरोप है कि वे लंबे समय से सर्जरी की प्रतीक्षा में थे और बार-बार अस्पताल से संपर्क कर रहे थे, लेकिन उन्हें उचित उपचार नहीं मिल पाया। वहीं, अस्पताल का कहना है कि जटिल शारीरिक स्थिति के कारण मेडिकल प्रबंधन ही एकमात्र विकल्प था।
अगस्त 2026 के अंतिम सप्ताह में स्थिति बिगड़ने पर उसे पुनः भर्ती किया गया था, जहाँ उसका हृदय-फेफड़ा प्रत्यारोपण (heart-lung transplant) की संभावनाओं के लिए मूल्यांकन किया जा रहा था। 1 सितंबर को अचानक स्वास्थ्य में भारी गिरावट के बाद उसे सांस लेने में कठिनाई हुई और ऑक्सीजन का स्तर काफी गिर गया। तमाम प्रयासों के बावजूद, 1 सितंबर की सुबह 5:06 बजे उसे मृत घोषित कर दिया गया। अब गठित समिति यह स्पष्ट करेगी कि पूरे 13 वर्षों के उपचार के दौरान क्या निर्णय लिए गए और अस्पताल की प्रक्रिया में क्या कमी रही।