संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने चेतावनी दी है कि दुनिया जल्द ही 1.5°C ग्लोबल वार्मिंग के स्तर को पार करने की ओर अग्रसर है। हालांकि यह कोई अंतिम बिंदु नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस सीमा के पार जाने पर भारत जैसे देशों के लिए जोखिम काफी अधिक और तात्कालिक हो जाते हैं। भारत अपनी भौगोलिक स्थिति और जलवायु के प्रति संवेदनशील कृषि व आर्थिक प्रणालियों के कारण सीधे तौर पर प्रभावित होने वाले देशों में शामिल है।
विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत की 80% से अधिक जनसंख्या उन जिलों में निवास करती है जो भीषण गर्मी, बाढ़, सूखे और चक्रवात जैसी जलवायु-प्रेरित आपदाओं के प्रति संवेदनशील हैं। पिछले शोध बताते हैं कि वर्ष 1981 से 2020 के बीच भारत का औसत ग्रीष्मकालीन अधिकतम तापमान लगभग 1°C बढ़ा है, साथ ही लू की आवृत्ति और तीव्रता में भी वृद्धि दर्ज की गई है। शोध यह भी संकेत देते हैं कि भीषण गर्मी और उमस की स्थिति अब केवल गर्मियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि मानसून के महीनों में भी मानवीय स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।
इसके अतिरिक्त, अल नीनो का प्रभाव भारतीय मानसून में सूखे के संबंध को मजबूत कर सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा और जल संकट का खतरा बढ़ रहा है। हिमालयी क्षेत्र में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है, जहां ग्लेशियरों के पिघलने की दर वर्ष 2000 के बाद से दोगुनी हो गई है। यह न केवल जल सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि पहाड़ों पर बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को भी बढ़ाता है।
इन चुनौतियों के बीच, तुर्की के अंताल्या में 9 से 20 नवंबर, 2026 तक आयोजित होने वाला COP31 सम्मेलन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उत्सर्जन में कटौती और कमजोर देशों के लिए वित्तीय सहायता जुटाने पर जोर दे रहा है। वैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि तापमान में हर अंश की वृद्धि को रोकना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग को कम करने का मतलब है भविष्य में भीषण गर्मी, जल तनाव और जलवायु आपदाओं के जोखिम को नियंत्रित करना।