भारत के कॉपीराइट कार्यालय ने स्पष्ट कर दिया है कि कृत्रिम मेधा यानी एआई (AI) द्वारा तैयार की गई रचनाओं का मालिकाना हक स्वयं एआई के पास नहीं हो सकता। हाल ही में एक आदेश के जरिए कार्यालय ने 'डाबस' (DABUS) नामक एआई सिस्टम को लेखक के रूप में मान्यता देने वाली एक याचिका को खारिज कर दिया है। यह फैसला तकनीकी और कानूनी दुनिया में काफी अहम माना जा रहा है।
मामला तब सामने आया जब अमेरिकी आविष्कारक डॉ. स्टीफन एल. थालर ने 'ए रीसेंट एंट्रेंस टू पैराडाइज' नामक कलाकृति के लिए कॉपीराइट की मांग की। उन्होंने आवेदन में 'डाबस' को ही लेखक बताया था। हालांकि, कॉपीराइट कार्यालय के रजिस्ट्रार प्रोफेसर उन्नत पी. पंडित ने अपने 31 अगस्त, 2026 के आदेश में इसे नामंजूर कर दिया। रजिस्ट्रार का कहना था कि कॉपीराइट कानून के तहत लेखक होने के लिए या तो एक प्राकृतिक व्यक्ति होना जरूरी है या फिर कानून द्वारा मान्यता प्राप्त कोई कानूनी संस्था। एआई इन दोनों ही श्रेणियों में नहीं आता है।
इस आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया कि एआई द्वारा बनाई गई कलाकृति रचनात्मक हो सकती है, लेकिन कानूनन उसका मालिकाना हक किसी इंसान को ही मिलेगा, जिसने उस काम को करने के लिए सिस्टम को प्रेरित या व्यवस्थित किया हो। कार्यालय ने तर्क दिया कि एआई की कार्यप्रणाली चाहे कितनी भी स्वायत्त क्यों न हो, वह कानूनी रूप से 'लेखक' का दर्जा हासिल नहीं कर सकती।
कानूनी विशेषज्ञों और कॉपीराइट कार्यालय का मानना है कि क्या एआई को कभी कानूनी व्यक्ति के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए, यह संसद के अधिकार क्षेत्र का विषय है। फिलहाल, प्रशासनिक स्तर पर एआई को लेखक मानना संभव नहीं है। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि भविष्य में एआई के बढ़ते इस्तेमाल के बीच भी, रचना का कानूनी अधिकार किसी इंसान के पास ही बना रहेगा। इससे पहले थालर ने दुनिया के अन्य देशों में भी ऐसे आवेदन किए थे, जिनमें से ज्यादातर में उन्हें इसी तरह की कानूनी बाधाओं का सामना करना पड़ा है।