लखनऊ में बुधवार को माताओं ने अपनी संतान की सुख-समृद्धि और लंबी आयु की कामना के साथ पारंपरिक हलषष्ठी व्रत रखा। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी के जन्मोत्सव के रूप में भी श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। इस अवसर पर महिलाएं अपने बच्चों के उत्तम स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए विशेष पूजा-अर्चना करती हैं।
ज्योतिषाचार्य एसएस नागपाल के अनुसार, उदया तिथि के आधार पर हलषष्ठी का पर्व दो सितंबर को मनाया जा रहा है। पूर्वी जिलों में इस व्रत को ललई छठ के नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत की सबसे बड़ी विशेषता इसका सात्विक स्वरूप है। व्रत रखने वाली महिलाएं हल से जुते हुए अनाज और सब्जियों का सेवन नहीं करती हैं। आहार में केवल वे खाद्य पदार्थ शामिल किए जाते हैं जो तालाबों में स्वतः उत्पन्न होते हैं, जैसे तिन्नी का चावल, पसही का चावल और केर्मुआ का साग।
पूजा पद्धति की बात करें तो व्रती महिलाएं अपने घर की दीवारों पर छठ माता का चित्र बनाती हैं। इसके साथ ही गणेश और माता गौरा की प्रतिमाओं की भी विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस दिन व्रती महिलाएं जमीन को लीपकर घर के भीतर ही एक छोटे तालाब का निर्माण करती हैं। इस प्रतीकात्मक तालाब में झरबेरी, पलाश और कांसी के पौधों को लगाकर वहां बैठकर पूजा और हलषष्ठी की कथा सुनी जाती है। यह पर्व शहर में पूरी आस्था और पारंपरिक निष्ठा के साथ मनाया जा रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में माताओं ने भागीदारी की है।