उत्तर प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में चिकित्सा सुविधाओं को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। सुलतानपुर के राजकीय स्वशासी चिकित्सा महाविद्यालय में एक नवजात की मृत्यु के मामले ने राज्य के नए मेडिकल कॉलेजों में बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि संस्थान में वेंटिलेटर और बाल शल्य चिकित्सा विशेषज्ञ न होने के कारण बच्चे को समय पर जरूरी उपचार नहीं मिल सका और रेफरल के दौरान उसकी जान चली गई। इस मामले पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने प्रदेश के नए मेडिकल कॉलेजों की कार्यक्षमता की गहन समीक्षा करने का निर्णय लिया है।
अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि केवल मेडिकल कॉलेज खोलना या एमबीबीएस की सीटें बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वहां आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों और जीवनरक्षक उपकरणों की उपलब्धता भी अनिवार्य है। पीठ ने पूछा है कि यदि किसी नए मेडिकल कॉलेज में प्रसव सेवाएं दी जा रही हैं, तो प्रसव के दौरान उत्पन्न होने वाली जटिलताओं से निपटने की तैयारी क्यों नहीं है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव, किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के कुलपति, संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान और डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के निदेशकों तथा सुलतानपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को अगली सुनवाई में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित रहने का निर्देश दिया है।
अदालत के सामने मुख्य प्रश्न यह है कि क्या प्रदेश के नए मेडिकल कॉलेज केवल कागजों पर मानक पूरे कर रहे हैं, या वहां मरीजों को वास्तविक उपचार मिल रहा है। इसके साथ ही, रेफरल व्यवस्था की खामियों पर भी अदालत ने चिंता जताई है। सुनवाई के दौरान सरकार से यह भी पूछा गया है कि पिछली जनहित याचिकाओं में दिए गए निर्देशों का कितना पालन हुआ है। इस मामले में अगली सुनवाई 11 सितंबर को होगी, जिसमें प्रदेश की स्वास्थ्य नीति और नए मेडिकल कॉलेजों की वास्तविक स्थिति पर विस्तार से चर्चा होने की उम्मीद है। यह घटना अब केवल एक स्थानीय अस्पताल की कमी तक सीमित न रहकर, पूरे प्रदेश की रेफरल और आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही का विषय बन गई है।