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उत्तर प्रदेश में मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए SHC योजना का विस्तार

🗺️ उत्तर प्रदेश 📅 20 सितम्बर 2026 · By BolHind Bureau
उत्तर प्रदेश में मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए SHC योजना का विस्तार
Photo: BolHindAI Team द्वारा निर्मित

खेती में उर्वरकों का सही उपयोग करने के लिए किसान को सबसे पहले अपनी जमीन की गुणवत्ता का पता होना चाहिए। इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए उत्तर प्रदेश में SHC योजना को प्रभावी ढंग से लागू किया जा रहा है। यह सरकारी पहल किसानों को उनके खेतों की मिट्टी की स्थिति को स्पष्ट रूप से समझने में मदद करती है, जिससे वे तय कर पाते हैं कि खेत को किन पोषक तत्वों की जरूरत है।

SHC का मुख्य कार्य किसान को यह बताना है कि मिट्टी में क्या मौजूद है और उसे किन चीजों की आवश्यकता है। यह कार्ड 12 मापदंडों के आधार पर तैयार किया जाता है, जिसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम और सल्फर जैसे प्राथमिक पोषक तत्व, सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे जिंक, आयरन, कॉपर, मैंगनीज और बोरॉन के साथ pH, विद्युत चालकता और ऑर्गेनिक कार्बन शामिल हैं।

इस प्रक्रिया में सबसे पहले खेत से मिट्टी का नमूना लिया जाता है। सैंपलिंग के नियमों के अनुसार, मिट्टी को 15–20 cm की गहराई से एकत्र किया जाता है। सिंचाई वाले क्षेत्रों में 2.5 हेक्टेयर और वर्षा आधारित क्षेत्रों में 10 हेक्टेयर के ग्रिड का उपयोग करके नमूने लिए जाते हैं। फिर इन्हें ICAR संस्थानों, कृषि विज्ञान केंद्रों या राज्य कृषि विश्वविद्यालयों जैसी अधिकृत प्रयोगशालाओं में परीक्षण के लिए भेजा जाता है।

परीक्षण के परिणामों के आधार पर, कार्ड में उर्वरकों और मिट्टी में सुधार के लिए आवश्यक उपायों की सिफारिशें की जाती हैं। यह प्रणाली किसान को बिना सोचे-समझे खाद डालने के बजाय, मिट्टी की वास्तविक जरूरतों के आधार पर उर्वरक प्रबंधन का निर्णय लेने में सक्षम बनाती है।

उत्तर प्रदेश के विभिन्न कृषि क्षेत्रों में मिट्टी की स्थिति अलग-अलग होती है, ऐसे में SHC एक विश्वसनीय आधार प्रदान करता है। यह योजना एक THREE-YEAR CYCLE में काम करती है, जिससे समय के साथ मिट्टी में आए पोषक तत्वों के बदलावों को भी ट्रैक किया जा सकता है। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण न केवल लागत कम करने में सहायक है, बल्कि कृषि भूमि के दीर्घकालिक स्वास्थ्य को भी सुरक्षित रखता है। किसानों के लिए यह जानकारीपूर्ण दस्तावेज अब बेहतर फसल प्रबंधन का एक अनिवार्य हिस्सा बनता जा रहा है, जिससे उन्हें यह स्पष्ट हो जाता है कि कब और किस उर्वरक की वास्तव में आवश्यकता है।

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