सहारनपुर की विश्व प्रसिद्ध काष्ठकला का इतिहास लगभग 400 साल पुराना है। यह नक्काशी न केवल इस शहर की पहचान है, बल्कि इसे GI टैग और ODOP योजना में भी स्थान मिला है। हालांकि, इस शानदार कला के पीछे शिवालिक वन रेंज में जारी अवैध कटान का काला सच भी छिपा है। स्थानीय लकड़ी उद्योग की भारी मांग और जंगलों में खैर, शीशम और सागौन की बेशकीमती लकड़ियों के बीच एक गहरा संकट पनप रहा है।
ETV भारत द्वारा की गई जमीनी पड़ताल में यह बात सामने आई कि सर्दियों और कोहरे के दौरान जब जंगल की निगरानी चुनौतीपूर्ण होती है, तब पेड़ों की कटाई का खतरा बढ़ जाता है। ग्रामीणों के अनुसार, तस्कर दिन में जंगलों की रेकी करते हैं और रात के अंधेरे में पेड़ों को निशाना बनाते हैं। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 5 वर्ष में अवैध कटान के करीब 200 मामले दर्ज किए गए हैं और लगभग 20 घन मीटर लकड़ी बरामद की गई है।
विभाग की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक, शिवालिक क्षेत्र में दिन और रात की गश्त के लिए 48 वन दरोगा और 22 वनकर्मी तैनात हैं। पिछले एक साल में करीब 30 वाहन सीज किए गए हैं और 10 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्षों में करीब 18 घन मीटर लकड़ी की नीलामी की गई है। फिलहाल 111 मामले अदालत में विचाराधीन हैं, जबकि 30 मामलों की जांच चल रही है।
सहारनपुर में करीब 180 आरा मशीनें हैं, जिनमें से 16 शिवालिक क्षेत्र में स्थित हैं। हालांकि, विभाग का कहना है कि वे किसी भी अवैध लकड़ी के परिवहन पर कड़ी नजर रखते हैं। प्रश्न यह उठता है कि क्या केवल जब्त की गई लकड़ी और दर्ज मुकदमों के आंकड़े इस समस्या का पूर्ण समाधान हैं? वास्तव में, काष्ठकला की चमक बनाए रखने के लिए यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि लकड़ी की आपूर्ति पूरी तरह वैध हो। जंगल से लेकर बाजार तक की श्रृंखला को ट्रैक करना ही इस उद्योग और शिवालिक के जंगलों को बचाने का एकमात्र मार्ग है।