सहारनपुर में कलेक्ट्रेट मस्जिद के विध्वंस का मामला अब कानूनी मोड़ पर आ गया है। इस विषय को लेकर जमीयत उलमा-ए-हिंद सक्रिय हो गई है और मामले की गंभीरता को देखते हुए संगठन ने एक विस्तृत रणनीति तैयार करने का निर्णय लिया है। संगठन के केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल ने सितंबर 9, 2026 को सहारनपुर का दौरा किया। इस दौरान टीम ने मामले से जुड़े प्रशासनिक, सामाजिक और कानूनी पहलुओं की गहन समीक्षा की।
प्रतिनिधिमंडल ने शहर के विभिन्न अधिवक्ताओं, राजनीतिक प्रतिनिधियों और सामाजिक हस्तियों के साथ बैठक कर विस्तृत चर्चा की। इस दौरान पूर्व सांसद हाजी फजलुर्रहमान और सांसद इमरान मसूद समेत अन्य प्रमुख व्यक्तियों से मुलाकात की गई। चर्चा का मुख्य केंद्र मस्जिद से संबंधित ऐतिहासिक दस्तावेज, राजस्व अभिलेख और भूमि स्वामित्व के दावों की वैधता को परखना रहा। जमीयत के पदाधिकारियों ने कहा कि जिस आधार पर विध्वंस की कार्रवाई की गई, उसे लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं और इस पर न्यायिक रिकॉर्ड की बारीकी से जांच आवश्यक है।
जमीयत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मुहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने बताया कि संगठन का लक्ष्य कानून के दायरे में रहकर न्याय प्राप्त करना है। उन्होंने प्रशासनिक कार्रवाई पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि प्रभावित पक्ष को अपना पक्ष रखने या कानूनी बचाव का उचित अवसर मिलना चाहिए था। उन्होंने स्पष्ट किया कि संवैधानिक अधिकारों के तहत अदालत का दरवाजा खटखटाना हर किसी का अधिकार है और किसी भी कार्रवाई को न्यायिक प्रक्रिया का पालन करते हुए ही होना चाहिए।
संगठन अब इन तमाम साक्ष्यों को अपने अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी के समक्ष प्रस्तुत करेगा। इसके बाद कानूनी विशेषज्ञों की राय के आधार पर उच्च न्यायालय या अन्य सक्षम मंचों पर चुनौती देने का निर्णय लिया जाएगा। मौलाना कासमी ने सहारनपुर वासियों से शांति और आपसी भाईचारा बनाए रखने की अपील की है। उन्होंने कहा कि यह मामला केवल किसी समुदाय विशेष का नहीं, बल्कि न्याय और संवैधानिक सिद्धांतों से जुड़ा है। जमीयत का मानना है कि शहर की ताकत यहां की गंगा-जमुनी एकता में निहित है और इसे शांतिपूर्ण तरीके से ही सुलझाया जाना चाहिए।